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मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

आधुनिक हिन्दू राष्ट्र

 देश में अंग्रेजी राज से पूर्व अनेक राज्य मुगलों के नियंत्रण से मुक्त हो गए थे। कई राजपूत और मराठा राज्य स्वतंत्र थे। आइए, इन हिन्दू राज्यों में हिन्दुओं की स्थिति पर एक नजर डालते है --

स्त्रिओं का स्थिति

मनुस्मृति के अनुसार स्त्री को विवाह पूर्व पिता, विवाह पश्चात् पति और वृद्धावस्था में अपने पुत्र पर आश्रित रहना चाहिए। स्त्रियों की शिक्षा और व्यवसाय का कोई अवसर नहीं था। परन्तु कई ब्राह्मण और सम्पन्न परिवारों में घर पर ही लड़कियों की शिक्षा प्रबन्ध किया जाता था। 

विधवा स्त्रियों के लिए समाज में कोई स्थान नहीं था। विधवाओं के लिए दो विकल्प थे या तो वे अपने पति के साथ सती हो जाए या काशी अथवा वृंदावन में पूजा-उपासना में अपना जीवन व्यतीत करे। पुनर्विवाह का अधार्मिक कार्य था। सती होना पुण्य कार्य, क्योंकि पति के बिना स्त्री के जीवन की कल्पना करना भी असम्भव था। विधवाओं का जीवन इतना दुष्कर था कि अनेक स्त्रियों विधवा जीवन से सती होना ज्यादा सुखदायी समझती था। विधवाओं को जबर्दस्ती सती करने की भी अनेक घटनाएँ इतिहास के काले पन्नों में लिखी हुई है। भारत में अंग्रजों ने जब सती निषेध कानून बनाया तब कई "कट्टर" हिन्दुओं ने उसका बहुत विरोध किया था।

शूद्रों की स्थिति

शूद्रों का शिक्षा, प्रशासन और धन-सम्पति पर कोई अधिकार नहीं था। वे अपने निर्धारित कर्म अर्थात् माली को माली का काम, नाई को नाई का काम, धोबी को धोबी का काम, भंगियो को सफाई का काम और चमारों के लिए जूते इत्यादि बनाने का काम निर्धारित था। शूद्रों में भंगी और चमारों को शूद्रों में भी सबने नीचे, अतिशूद्र या दलित माना जाता था।  "उच्च" वर्णों के लोग इनकी परछाई से भी दूर भागते थे।  अतिशूद्रों अथवा दलितों को समाज हमेशा से समाज से अलग रखा जाता था। उनकी झोंपड़ियाँ नगर अथवा गाँवों से बाहर होती थी। वे नियत समय पर ही नगर में प्रवेश कर सकते थे। वे "उच्च" वर्णों के कुओं इत्यादि से पानी नहीं भर सकते थे।

पेश्वा शासन में शूद्रों को अपने साथ एक हाड़ी और एक झाडू रखना आवश्यक था। जिसके वे सिर्फ अपनी हाड़ी में ही थूके और चलते समय सड़क को साफ करते रहे। अगर गलती से किसी शूद्र ने किसी "उच्च" वर्ण के व्यक्ति को छू दिया तो समझो उसकी शामत आ गई।

इन परिस्थितियों में यह स्वाभाविक ही था कि शूद्र अंग्रेजी राज का दिल से स्वागत करते।



प्राचीन हिंदू राष्ट्र - रामराज्य

 रामराज्य का आदर्श

रामराज्य हिन्दुओं का आदर्श समाज अथवा राज्य है जहाँ सभी "नागरिक" सुखी और स्वस्थ रहे। व्यक्तियों की आयु 100 वर्ष की हो। यहाँ "नागरिक" जानबूझ कर इसलिए लिखा गया है क्योंकि इस राज्य में जंगली लोगों (अथवा असुर या राक्षसों) का प्रवेश वर्जित है।

 वर्ण-व्यवस्था

इस रामराज्य की स्थापना के लिए वर्ण-व्यवस्था का प्रावधान किया है। वर्ण व्यवस्था के अनुसार सभी नागरिकों को उनके स्वभाव अथवा जन्मजात गुणों के आधार पर चार वर्णों में बाँटा गया है। चारों वर्ण और उनके अधिकार निम्न प्रकार है --

स्तर वर्ण विषय अधिकार कर्तव्य
1. ब्राह्मण धर्म शिक्षा और धर्म समाज का मार्गदर्शन
2. क्षत्रिय बल शासन और सेना राष्ट्र की सुरक्षा
3. वैश्य धन व्यापार धर्म और राष्ट्र के लिए धन व्यवस्था
4. शूद्र श्रम सेवा, खेती, शिल्प इत्यादि उपरोक्त तीनों वर्णों की सेवा

 वर्णों पर आधारित अधिकार और कर्तव्य एक प्रकार की आरक्षण व्यवस्था थी जिसमें जन्म के आधार पर लोगों का व्यवसाय निर्धारित था। अब पुरोधित का बेटा पुरोहित, आचार्य का बेटा, राजा का बेटा राजा, सेनापति का बेटा, मंत्री का बेटा मंत्री, नौकर का बेटा नौकर, कोतवाल का बेटा कोतवाल, जमींदार का बेटा जमींदार, व्यापारी का बेटा व्यापारी, सूदखोर का बेटा सूदखोर, किसान का बेटा किसान, हलवाई का बेटा हलवाई, नाई का बेटा नाई, धोबी का बेटी धोबी,  मजदूर का बेटा मजदूर ही बन सकता था।

शिक्षा व्यवस्था

रामराज्य में शिक्षा के लिए गुरुकुलों की व्यवस्था थी। केवल प्रथम तीनों वर्ण के बच्चे को शिक्षा का अधिकार था।

क्रम वर्ण शिक्षा का स्तर
अधिकार
1. ब्राह्मण उच्चवेदों की रचना और अध्यापन
2. क्षत्रिय मध्यमधर्म, शासन और शस्त्र प्रशिक्षण
3. वैश्य निम्नधर्म और व्यापार की शिक्षा
4. शूद्र -पारंपारिक व्यवसाय

 इस विषय में किसी को किसी प्रकार का भ्रम नहीं होना चाहिए कि शिक्षा के स्तर से ही व्यक्ति के सामाजिक स्तर निर्धारण होता है। ब्राह्मणों ने धर्म और शिक्षा को अपने अधिकार पर रखकर, तथा अन्य वर्णों की शिक्षा को नियंत्रित करके समाज में एक अप्राकृतिक गुणों के विकास को बढ़ावा दिया।

  शूद्रों को शिक्षा, प्रशासन और धन पर कोई अधिकार नहीं था। परन्तु शिक्षा के अभाव से वे अपने पारंपरिक व्यसायों के अलावा अन्य किसी भी प्रकार के कार्य को करने में असमर्थ हो गए। आधुनिक काल में अंग्रेजी शासन के अंतर्गत सर्वप्रथम शूद्रों को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ।